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राई सरसों के उत्पादन में भूमि चयन का महत्व
सरसों की अधिकतम उपज के लिए ध्यान रखने योग्य बातें
सरसों के बीज का चयन एवं बुआई का समय
कीट पतंगों का नियंत्रण
सरसों की फसल के रोग व उनकी रोकथाम
प्रतिकूल परिस्थितियों में सरसों का रखरखाव :
कटाई के दौरान सरसों में हानि से बचाव
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राई सरसों के उत्पादन में भूमि चयन का महत्व  

 

राई-सरसों विश्व की एक महत्व पूर्ण तिलहन फसल है क्योंकि इसके बीजों में दिर्फ़ तेल की अच्छी मात्रा (४०-५०%) ही नहीं, बल्कि इसकी तेल रहित खली में उच्च दर्जे की प्रोटीन भी अधिक मात्रा में (३०-३५%) पाई जाती है | यह फसल उष्ण कटिबंध से लेकर शीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में विश्व के करीब १२० देशो में उगाई जाती है | भारत की अर्थव्यवस्था में राई-सरसों का महत्वपूर्ण स्थान है | इस फसल का अधिकतम क्षेत्रफल भारत में है जबकि उत्पादन में भारत दुसरे स्थान पैर है | भारत में इसकी खेती मुख्यतः राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, हिमांचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर व उत्तरपूर्वी प्रदेशों मे होती है | भारत मे मुख्यतः राई सरसों व तोरिया प्रजातियाँ उगाई जाती हैं | 

इसके लिए दोमट मिटटी व हलकी-रेतीली मिटटी उपयोगी होती है, हालाँकि यह चिकनी, हलकी रेतीली और यहाँ तक लावा मिटटी मे भी उगाई जा सकती है. अच्छे जल निकासी वाली भूमि इसके लिए उपुक्त होती है. अगर ऐसी व्यवस्था वाली भूमि है तो निचले धरातल वाली भूमि पर भी खेती की जा सकती है. भूमि का जल मग्न होना खेती के लिए हानिकारक है. करीब ६.० से ८.०पी. एच.वाली भूमि पैर उत्पादन हो सकता है. अधिक क्षारीय व अम्लीय भूमि, अंकुरण तथा पौधे विकास के लिए हानिकारक है.

पर्याप्त अन्कुरण, पौधे के पूर्ण विकास एवं अधिकतम उपज प्राप्त करने हेतु भूमि की अच्छी तैयारी नितांत आवश्यक है. सिंचित व असिंचित (बारानी) दोनों किस्म की भूमि मे जल संरक्षण करना अति आवश्यक है. इसके लिए वर्षा ऋतू से पहले खेत की अच्छी जुताई करनी चाहिए. मानसून की बौछार के बाद समय-समय पर खेत को हल-हैरो से तैयार करके पता लगा देना चाहिए. इस प्रक्रिया से भूमि मे नमी संरक्षण के साथ खरपतवार भी नष्ट हो जाते हैं. अप्रयाप्त नमी वाली जमीन मे बुवाई से पूर्व एक सिचाई (पलेवा) देते हैं. अच्छे अन्कुरण के लिए भूमि मे उचित आद्रता के साथ मिटटी का भुरभुरा होना आवश्यक है. तीन चार जुताई के बाद जमीन मे पाटा लगाने से जमीन बुवाई के लिए उपुक्त हो जाती है.

मिटटी मे खरपतवार, कीट व रोग पलते व बढ़ते है जो फसल को हानि पहुचाते हैं. ग्रीष्म ऋतू मे गहरी जुताई करने से हनी कारक कीट, रोग व खरपतवार के बीज नष्ट हो जाते हैं. खेत की तैयारी के अंतिम चरण मे, बुवाई से पहले ४% इन्डोसल्फान या १.५% क़ुइनल्फ़ास की धूल डालने व मिटटी के साथ मिलाने से दीमक व अन्य नुकसान पहुचने वाले कीटों तथा उनके अंडे नष्ट हो जाते है.
 

 

डा. आर. के. कटियार,
पादप जैव प्रोद्योगिकी केन्द्र, 
भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नयी दिल्ली, - 12

 
 
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